कमज़ोर सा हो गया हूँ कुछ,
झुर्रियां दिखनी लगी हैं किनोरों पर,
पटक देता है कोई भी, नाक सिकोड़ के,
सीले हुए बासी अख़बार की तरह।
अबकी बरसात मोटे गत्ते की जिल्द ने भी दम तोड़ दिया,
सीने में ठण्ड उतर गयी थी उसके।
गर तुम होतीं, श्याही बनकर महकती मुझ पर,
लोग सीने से लगा के सो जाते लॉबी में,
आराम कुर्सी पर, ऐनक की एक डंडी मूह में डाले।
तुम्हें याद हैं?
आखरी बार, दबे हाथों से,
तुमने लिखे थे कुछ एहसास,
पलट कर देखतीं ज़रा तुम,
मैं वहीँ था, बे-रंग धुंधला सा,
गाढ़े लिखे अक्षरों का अक्स लिए।
खैर !
सोचता हूँ,
अब रिटायरमेंट ले लूँ,
हो जाऊं आज़ाद इन 'स्पाइरल बाइंडिंग' के चंगुल से,
और बन जाऊं किसी बच्चे का हवाई-जहाज़,
वो मेज़ पर घिसे मुझे,
किनोरों को पैना करे,
एक फूँक पंखों में भरके,
उड़ जाऊं खुले आसमां में,
लेहराऊं कुछ देर,
और एक आखरी गोते के साथ,
धीरे से बैठ जाऊं तुम्हारे पास आकर।
पुरानी डायरी का खाली पन्ना हूँ मैं !
किनोरों को पैना करे,
एक फूँक पंखों में भरके,
उड़ जाऊं खुले आसमां में,
लेहराऊं कुछ देर,
और एक आखरी गोते के साथ,
धीरे से बैठ जाऊं तुम्हारे पास आकर।
पुरानी डायरी का खाली पन्ना हूँ मैं !
'दीप'
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