Saturday, June 27

the canvas

बिस्तर पर यूँ चली उंगलियां रात भर,
के सिलवटों ने तेरा अक्स उकेर दिया,
फिर सुबह खिड़की से एक लम्बी किरण आई
कूँची बन कर,

रंग सुनेहरा उसमें भरने को।

यूं ही रोज़ थोड़ा थोड़ा तराशता रहता हूँ तुझे,
बिस्तर बिखरा पड़ा है मेरा,
तेरी तस्वीर मुकम्मल होने तक।


दीप