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मैंने कश्ती से यूँ ही पूछा था
मौसम का मिजाज़,
उसने बेबाकी से मेरा हाथ पकड़ा और कहा -
चलो लहरों के बीच चलकर देखते हैं।
बस फिर क्या था!
लहरों के उतार चढ़ाव नापते-नापते
कश्ती से मोहब्बत हो गयी।
कम्पास की सुई भी सौतन की तरह जल-भुन गयी है,
देखो, जंग लग गया है उसमें।
अब हवा का रूख़ नहीं देखता मैं।
'दीप'