Sunday, May 17

Odyssey

मैंने कश्ती से यूँ  ही पूछा था
मौसम का मिजाज़,
उसने बेबाकी से मेरा हाथ पकड़ा और कहा -
चलो लहरों के बीच चलकर देखते हैं। 

बस फिर क्या था!
लहरों के उतार चढ़ाव नापते-नापते 
कश्ती से मोहब्बत हो गयी। 

कम्पास की सुई भी सौतन की तरह जल-भुन गयी है,
देखो, जंग लग गया है उसमें।

अब हवा का रूख़ नहीं देखता मैं। 

'दीप'

5 comments: