Wednesday, April 18

छत ‘the terrace’


मकान की छत और मैं अकेले से हो गए हैं। 

आसमां धुंधला ओ चूका है,
बादलों ने भी चित्रकारी छोड़ दी है,
चिड़ियों ने भी इनमे रंग भरना बंद कर दिया है, 
सारे रिश्ते कटने लगे है, बूढ़ा जो हो गया है। 

कुछ पेड़ भी थे शहर में,
कभी ढूंढ़ता हूँ उन्हें तो फक़त खंबे दिखते हैं,
LED लाइट की चकाचौंध मैं,
कुछ विदेशी दुकानें सजती हैं, सुना है महंगी होती हैं।  

महकती हवाएं अब उदास हो चली हैं,
मुझसे मिला करती थी कभी, हाल चाल पूछा करती थी,
हम घंटों करते थे बातें बैठ कर,
अबकी बार मिली तो बीमार सी लगी, कमज़ोर हो गयी है बहूत। 

दूर नज़र जाए तो कुछ पहाड़ दिखते थे,
अब कुछ आलिशान होटल और मॉल नज़र आते हैं,
आजकल लोग इन्ही में घुमते हैं weekends पर,
कुछ environmentalist भी आते हैं, मीटिंग होती हैं यहाँ पर।

नीचे गली में कोई क्रिकेट खेलता नहीं दिखता,
अब छत पर कटी हुई पतंगें भी नहीं मिलती,
गर्मियों में भी नीचे ही सोते हैं सब,
टेबल-कुर्सिओं के साथ।

मकान की छत और मैं अकेले से हो गए हैं।

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