Tuesday, October 30

त्रिवेणी


सर्द सुबह को कुछ यूँ काटा जाए,
कोहरे को हटा कर किरणों को छांटा जाए। 

कुदरत है या फलसफा-ए-ज़िन्दगी।

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नया सवेरा, नया दिन,
फिर एक शाम तेरे बिन। 

तुम जबसे गयी हो, रातें नहीं गिनता मैं।

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